भगवद गीता अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग – Arjun Vishad Yoga

भगवद्गीता का प्रथम अध्याय ‘अर्जुन विषाद योग’ मानव मनोविज्ञान की सूक्ष्मतम परतों को उद्घाटित करता है। युद्धभूमि के मध्य खड़े अर्जुन, कुरुक्षेत्र में अपने ही बंधु-बांधवों को सम्मुख देखकर करुणा, मोह और कर्तव्य-संकट से व्याकुल हो उठते हैं। वे शौर्य के स्थान पर नैतिक दुविधा को अनुभव करते हुए शस्त्र त्याग की इच्छा प्रकट करते हैं। यह विषाद केवल दुर्बलता नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की शुरुआत है, जो आगे चलकर कृष्ण के दिव्य उपदेशों का आधार बनती है। इस प्रकार अध्याय मनुष्य के अस्तित्वगत प्रश्नों, धर्म-संकट और ज्ञान-प्राप्ति की अनिवार्य भूमिका को स्थापित करता है।


श्लोक – 1

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श्लोक – 2

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श्लोक – 3

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श्लोक – 4

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श्लोक – 5

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श्लोक – 6

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श्लोक – 7

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श्लोक – 8

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श्लोक – 9

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श्लोक – 10

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श्लोक – 11

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श्लोक – 12

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श्लोक – 13

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श्लोक – 14

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श्लोक – 15

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श्लोक – 16

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श्लोक – 17-18

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श्लोक – 19

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श्लोक – 20-21

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श्लोक – 22

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श्लोक – 23

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श्लोक – 24-25

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श्लोक – 26-27

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श्लोक – 27-28

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श्लोक – 28-29

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श्लोक – 30

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श्लोक – 31

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श्लोक – 32

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श्लोक – 33

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श्लोक – 34

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श्लोक – 35

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श्लोक – 36

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श्लोक – 37

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श्लोक – 38-39

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श्लोक – 40

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श्लोक – 41

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श्लोक – 42

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श्लोक – 43

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श्लोक – 44

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श्लोक – 45

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श्लोक – 46

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श्लोक – 47

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1 thought on “भगवद गीता अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग – Arjun Vishad Yoga”

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