हिंदी व्याकरण की संपूर्ण मार्गदर्शिका

परिभाषा, प्रमुख विभाग, नियम, उदाहरण और विषयों की क्रमबद्ध सूची

हिंदी व्याकरण हिंदी भाषा की ध्वनियों, शब्दों, रूपों और वाक्यों की व्यवस्था का अध्ययन है। यह बताता है कि शब्द कैसे बनते हैं, उनके रूप किन परिस्थितियों में बदलते हैं और वे मिलकर अर्थ कैसे व्यक्त करते हैं। इसके प्रमुख विद्यालयी विभाग वर्ण-विचार, शब्द-विचार और वाक्य-विचार हैं।

हम कहते हैं, “बच्चा खेलता है” और “बच्ची खेलती है।” दोनों वाक्यों में एक ही कार्य व्यक्त हुआ है, लेकिन कर्ता का लिंग बदलने पर क्रिया का रूप बदल गया। इसी प्रकार “बच्चे खेलते हैं” में वचन का परिवर्तन दिखाई देता है। व्याकरण ऐसे संबंधों को पहचानने और भाषा का स्पष्ट, सुसंगत तथा प्रसंगानुकूल प्रयोग करने की समझ देता है।

यह मार्गदर्शिका हिंदी व्याकरण के आरंभिक अध्ययन से लेकर पद-परिचय, वाक्य-रूपांतरण और अर्थ-संबंधों तक का परिचय देती है। इसमें नियमों के साथ उदाहरण, सामान्य भ्रम, अभ्यास और उत्तर शामिल हैं। अंत में दी गई विषय सूची किसी विशेष अध्याय को चुनने और व्यवस्थित अध्ययन की योजना बनाने में सहायता करेगी।

हिंदी व्याकरण क्या है?

हिंदी व्याकरण (Hindi Vyakaran) का शैक्षणिक चित्र, जिसमें वर्ण, शब्द, वाक्य, संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया जैसे प्रमुख विषय दर्शाए गए हैं।
हिंदी व्याकरण (Hindi Grammar) के 100 से अधिक महत्वपूर्ण विषयों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करें। परिभाषाएँ, नियम, भेद और उदाहरण सहित सम्पूर्ण हिंदी व्याकरण सरल भाषा में सीखें।

हिंदी भाषा की संरचना और प्रयोग में दिखाई देने वाले नियमों का व्यवस्थित विवेचन हिंदी व्याकरण कहलाता है। इसके अंतर्गत शब्दों के निर्माण, उनके रूप-परिवर्तन और वाक्यों में उनके पारस्परिक संबंधों को समझा जाता है।

व्याकरण केवल सही और गलत वाक्यों की सूची नहीं है। यह इस प्रश्न का उत्तर भी देता है कि कोई रूप किस परिस्थिति में उपयुक्त है। उदाहरण के लिए, “आप आते हैं” में ‘आप’ एक व्यक्ति के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है। यहाँ बहुवचन क्रिया आदर व्यक्त करती है। इस प्रकार व्याकरणिक रूप का संबंध संख्या के साथ सामाजिक व्यवहार से भी हो सकता है।

भाषा और व्याकरण का संबंध

बच्चे औपचारिक नियम पढ़ने से पहले ही आसपास की भाषा सीखने लगते हैं। सुनने, बोलने और संवाद करने से उन्हें उसकी व्यवस्था का अनुभव मिलता है। व्याकरण इस सहज ज्ञान को स्पष्ट अवधारणाओं और नियमों में समझने का साधन है।

वर्णनात्मक व्याकरण भाषा के वास्तविक प्रयोग का अध्ययन करता है। मानक या नियमपरक व्याकरण शिक्षा, औपचारिक लेखन और सार्वजनिक संचार में स्वीकार किए गए रूपों को व्यवस्थित करता है। दोनों दृष्टियाँ उपयोगी हैं। क्षेत्रीय भाषा-रूप को केवल मानक हिंदी से अलग होने के कारण अव्यवस्थित या अशुद्ध नहीं माना जा सकता।

हिंदी व्याकरण का महत्त्व

व्याकरण की समझ से पढ़ते समय वाक्य का अर्थ स्पष्ट होता है, लिखते समय शब्दों का उचित मेल बैठता है और बोलते समय विचारों को क्रम मिलता है। इसका लाभ पत्र, अनुच्छेद, निबंध, समाचार, संवाद और शैक्षिक उत्तर लिखने में मिलता है। नियम के पीछे का कारण समझने वाला विद्यार्थी नए उदाहरणों पर भी अपने ज्ञान का प्रयोग कर सकता है।

भाषा बोली लिपि और मानक हिंदी

भाषा संप्रेषण की व्यवस्थित सामाजिक प्रणाली है। बोली किसी क्षेत्र या समुदाय में प्रचलित भाषा-रूप है। लिपि भाषा को लिखने के लिए प्रयुक्त चिह्न-व्यवस्था है। भाषा और बोली के बीच सीमा केवल व्याकरण से तय नहीं होती; इतिहास, समाज और सामूहिक पहचान की भी भूमिका होती है।

अवधारणाअर्थउदाहरण
भाषाविचार और अनुभव व्यक्त करने की भाषिक प्रणालीहिंदी, तमिल, बांग्ला
बोलीक्षेत्रीय या सामाजिक भाषिक रूपहिंदी-क्षेत्र के अध्ययन में ब्रज और अवधी आदि
लिपिलिखित चिह्नों की व्यवस्थादेवनागरी, रोमन
मानक हिंदीऔपचारिक संचार के लिए स्वीकृत और व्यवस्थित हिंदी-रूपपाठ्यपुस्तकों और औपचारिक लेखन की हिंदी

हिंदी सामान्यतः देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। देवनागरी में व्यंजन-चिह्न के साथ निहित स्वर की व्यवस्था होती है; मात्राएँ और हलंत उस लिखित रूप को बदलते हैं। यह पूर्णतः एक-ध्वनि-एक-चिह्न वाली प्रणाली नहीं है, इसलिए मानक वर्तनी और वास्तविक उच्चारण का अध्ययन साथ करना चाहिए।

हिंदी का विकास भारतीय आर्य भाषाओं की दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है। प्राचीन, मध्य और आधुनिक आर्य भाषिक चरणों के बीच परिवर्तन और क्षेत्रीय विविधता रही है। आधुनिक मानक हिंदी का व्याकरणिक आधार मुख्यतः खड़ी बोली से जुड़ा है, जबकि उसका शब्द-भंडार अनेक भाषिक संपर्कों से समृद्ध हुआ है। पूरे हिंदी-क्षेत्र के इतिहास को किसी एक सीधी, अपरिवर्तित श्रृंखला में समेटना उचित नहीं है।

हिंदी व्याकरण के प्रमुख विभाग

विद्यालयी अध्ययन में व्याकरण को प्रायः तीन प्रमुख विभागों में पढ़ाया जाता है। व्यापक भाषावैज्ञानिक अध्ययन में ध्वनि-विज्ञान, रूप-विज्ञान, वाक्य-विज्ञान, अर्थ-विज्ञान और भाषा-प्रयोग के बीच अधिक सूक्ष्म भेद किए जाते हैं।

विभागमुख्य प्रश्नप्रमुख विषय
वर्ण-विचारध्वनियाँ और उनके लिखित रूप कैसे व्यवस्थित हैंस्वर, व्यंजन, मात्राएँ, उच्चारण
शब्द-विचारशब्द कैसे बनते और बदलते हैंशब्दभेद, लिंग, वचन, कारक, शब्द-निर्माण
वाक्य-विचारपद मिलकर वाक्य कैसे बनाते हैंपदक्रम, अन्वय, पदबंध, उपवाक्य, रूपांतरण

वर्तनी, शब्दार्थ और साहित्यिक अभिव्यक्ति इनसे जुड़े अध्ययन-क्षेत्र हैं। रस और छंद काव्यशास्त्र के विषय हैं; उन्हें व्याकरण का मूल विभाग मानने के बजाय व्यापक हिंदी-अध्ययन के पूरक विषयों के रूप में समझना अधिक सटीक है।

वर्ण ध्वनि मात्राएँ और उच्चारण

ध्वनि का संबंध बोलने और सुनने से है; लिपि-चिह्न का संबंध लिखने और पढ़ने से है। विद्यालयी वर्ण-विचार में इन दोनों पक्षों को साथ पढ़ाया जाता है। स्वर, व्यंजन और उनके संयोजन समझे बिना शब्दों की वर्तनी और उच्चारण का व्यवस्थित अध्ययन कठिन होता है।

स्वर और व्यंजन

स्वर वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में मुखमार्ग में वैसा अवरोध नहीं बनता जैसा अनेक व्यंजनों में होता है। व्यंजन के उच्चारण में किसी स्थान पर स्पर्श, संकुचन या अन्य प्रकार का अवरोध होता है। विद्यालयी स्वर-सूची में अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ और औ पढ़ाए जाते हैं। आधुनिक हिंदी के उच्चारण में ‘ऋ’ का व्यवहार संस्कृत से भिन्न हो सकता है।

व्यंजनों के पाँच परंपरागत वर्ग हैं: क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग और प-वर्ग। इनके अतिरिक्त य, र, ल, व, श, ष, स और ह तथा प्रचलित अतिरिक्त चिह्नों का अध्ययन होता है। वर्णों की कुल संख्या बताने से पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि गणना में कौन-से अतिरिक्त स्वर, नुक्तायुक्त वर्ण और संयुक्ताक्षर शामिल हैं।

मात्राएँ और बारहखड़ी

मात्रा व्यंजन के साथ स्वर को व्यक्त करने वाला आश्रित लिखित चिह्न है। ‘अ’ के लिए अलग मात्रा-चिह्न नहीं होता। उदाहरण के लिए, क, का, कि, की, कु, कू, कृ, के, कै, को, कौ अलग स्वर-संयोजन दिखाते हैं। ‘कि’ में मात्रा लिखित रूप में पहले दिखाई देती है, लेकिन उच्चारण में स्वर व्यंजन के बाद आता है।

बारहखड़ी इन संयोजनों का अभ्यास कराती है। कई बारहखड़ी तालिकाओं में ‘कं’ और ‘कः’ भी दिए जाते हैं। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अनुस्वार और विसर्ग स्वतंत्र स्वर हैं।

उच्चारण स्थान और प्रयत्न

परंपरागत वर्गीकरण में क-वर्ग को कंठ्य, च-वर्ग को तालव्य, ट-वर्ग को मूर्धन्य, त-वर्ग को दंत्य और प-वर्ग को ओष्ठ्य कहा जाता है। आधुनिक ध्वनिविज्ञान इन स्थानों और उच्चारण-विधियों का अधिक सूक्ष्म वर्णन करता है।

घोष-अघोष का संबंध स्वर-तंत्रियों के कंपन से और अल्पप्राण-महाप्राण का संबंध श्वास के अपेक्षाकृत कम या अधिक प्रबल निर्गमन से है। ‘क–ग’ घोषत्व का और ‘क–ख’ प्राणत्व का भेद समझाने वाले सरल युग्म हैं। दोनों वर्गीकरणों को एक ही बात नहीं मानना चाहिए।

अनुस्वार अनुनासिक विसर्ग और नुक्ता

तत्वपहचानउदाहरण या उपयोग
अनुस्वारबिंदु ‘ं’; प्रायः नासिक्य व्यंजन का संकेतअंक, संबंध
अनुनासिकतास्वर के उच्चारण में नासिका की भागीदारी; प्रायः चंद्रबिंदु ‘ँ’माँ, हँसी
विसर्ग‘ः’ चिह्नदुःख, प्रातः
नुक्तावर्ण के नीचे बिंदुक़, ख़, ग़, ज़, फ़, ड़, ढ़

अनुनासिकता उच्चारण का गुण है, जबकि अनुस्वार एक लिखित चिह्न है। कुछ शब्दों में लिपि की सुविधा से बिंदु अनुनासिक स्वर को भी व्यक्त करता है, जैसे ‘मैं’ और ‘हैं’। इसलिए केवल बिंदु देखकर हर स्थान पर एक ही ध्वन्यात्मक निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

संयुक्त व्यंजन द्वित्व रेफ और पदेन र

दो या अधिक व्यंजनों के संयोग से संयुक्त रूप बनता है, जैसे क् + ष = क्ष और त् + र = त्र। एक ही व्यंजन की पुनरावृत्ति द्वित्व है, जैसे ‘पक्का’ में क्क। इस अर्थ में द्वित्व संयुक्त व्यंजन-संयोग का विशिष्ट रूप है।

र् के बाद व्यंजन आने पर बनने वाला ऊपर का चिह्न रेफ कहलाता है, जैसे ‘अर्थ’। व्यंजन के बाद जुड़े र का रूप प्रायः रकार या पदेन र कहलाता है, जैसे ‘प्रकार’। वर्ण-विच्छेद में मात्रा और हलंत की भूमिका ध्यान से देखनी चाहिए: कमल = क् + अ + म् + अ + ल् + अ लिखित वर्ण-विच्छेद है; इसे वास्तविक बोलचाल के उच्चारण का हूबहू प्रतिलेखन न समझें।

शब्द विचार और शब्दों का वर्गीकरण

शब्द भाषा की अर्थपूर्ण इकाई है। वाक्य में व्याकरणिक भूमिका के साथ प्रयुक्त शब्द को पद कहा जाता है। ‘फूल’ एक शब्द है; “फूल खिला है” में वह संज्ञा पद है। शब्द को उसकी उत्पत्ति, रचना और प्रयोग के आधार पर अलग-अलग वर्गों में रखा जा सकता है।

उत्पत्ति और रचना के आधार पर शब्द

आधारभेदउदाहरण
उत्पत्तितत्समअग्नि, हस्त
उत्पत्तितद्भवआग, हाथ
उत्पत्तिदेशजस्थानीय बोलचाल से आए, जिनकी व्युत्पत्ति हमेशा निश्चित नहीं
उत्पत्तिविदेशीअंग्रेज़ी से ‘स्कूल’, अरबी से ‘किताब’
रचनारूढ़घर, जल
रचनायौगिकपुस्तकालय, विद्यालय
रचनायोगरूढ़पंकज, जब विशिष्ट अर्थ ‘कमल’ हो
मिश्रित निर्माणसंकररेलगाड़ी

तत्सम शब्द संस्कृत से अपेक्षाकृत मूल रूप में ग्रहण किए गए हैं; तद्भव शब्द ऐतिहासिक ध्वनि-परिवर्तनों से विकसित हुए हैं। किसी अपरिचित शब्द को केवल अनुमान से देशज नहीं मानना चाहिए। उसकी उत्पत्ति की जाँच शब्दकोशीय प्रमाण से होती है।

विकारी अविकारी और अर्थ की भूमिका

जिन शब्दवर्गों में व्याकरणिक कारणों से रूप बदलते हैं, वे विकारी कहलाते हैं। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया इस वर्ग में पढ़ाए जाते हैं। अविकारी शब्द लिंग, वचन या पुरुष के कारण सामान्यतः नहीं बदलते। फिर भी हर विकारी वर्ग के प्रत्येक शब्द का रूप हर स्थिति में बदलना आवश्यक नहीं है; ‘सुंदर’ का रूप ‘सुंदर लड़का’ और ‘सुंदर लड़की’ में समान है।

विद्यालयी अध्ययन में सार्थक और निरर्थक शब्दों का भेद भी आता है। ‘चाय-वाय’ में ‘वाय’ का स्वतंत्र शब्दकोशीय अर्थ नहीं है, लेकिन पूरा प्रयोग ‘चाय और उससे जुड़ी अन्य चीज़ें’ जैसा संकेत दे सकता है। इसलिए स्वतंत्र अर्थ का न होना और संदर्भ में कोई कार्य न होना अलग बातें हैं।

संज्ञा लिंग वचन और कारक

संज्ञा की परिभाषा और भेद

जिस पद से व्यक्ति, वस्तु, स्थान, पदार्थ, समूह, गुण, अवस्था या भाव का नाम व्यक्त हो, वह संज्ञा है। संज्ञा की पहचान उसके अर्थ और वाक्य में प्रयोग, दोनों के आधार पर करनी चाहिए।

भेदपहचानउदाहरण
व्यक्तिवाचकविशेष व्यक्ति, स्थान या इकाई का नामसीमा, जयपुर
जातिवाचककिसी वर्ग का सामान्य नामलड़की, नगर
भाववाचकगुण, अवस्था, भाव या क्रिया का नाममिठास, बचपन, हँसी
द्रव्यवाचकपदार्थ का नामसोना, दूध
समूहवाचकसमूह का नामसेना, झुंड

कुछ वर्गीकरणों में द्रव्यवाचक और समूहवाचक को जातिवाचक के अंतर्गत रखा जाता है। इसलिए संज्ञा के तीन या पाँच भेद मिलने पर उनके आधार को समझें। भाववाचक संज्ञाएँ दूसरे शब्दों से भी बनती हैं, जैसे मीठा → मिठास, बच्चा → बचपन, मित्र → मित्रता।

लिंग और लिंग परिवर्तन

हिंदी में मुख्यतः पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का व्याकरणिक भेद है। व्याकरणिक लिंग केवल जैविक लिंग नहीं है; ‘मेज़’ स्त्रीलिंग और ‘कमरा’ पुल्लिंग है। शब्द के अंतिम अक्षर से कभी संकेत मिलता है, पर वह सार्वभौम नियम नहीं है। ‘पानी’ का अंत ई की ध्वनि से होता है, फिर भी वह पुल्लिंग है।

लिंग परिवर्तन में रूपांतरण और अलग शब्द, दोनों मिलते हैं: लड़का–लड़की, लेखक–लेखिका, भाई–बहन। अनेक निर्जीव संज्ञाओं का सामान्य अर्थ में कोई लिंग-परिवर्तन नहीं किया जाता।

वचन और तिर्यक रूप

एकवचन एक और बहुवचन एक से अधिक का बोध कराता है। रूप बदलते समय यह भी देखना होता है कि संज्ञा के बाद परसर्ग है या नहीं।

शब्दसीधा बहुवचनपरसर्ग के साथ बहुवचन
लड़कालड़केलड़कों को
लड़कीलड़कियाँलड़कियों से
पुस्तकपुस्तकेंपुस्तकों में
घरघरघरों तक

परसर्ग के पहले आने वाला बदला हुआ रूप तिर्यक रूप कहलाता है। “लड़के आए” और “लड़कों को बुलाओ” में इसी कारण अंतर है।

कारक और विभक्ति

कारक संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया अथवा वाक्य के अन्य पदों से संबंध बताता है। विभक्ति और परसर्ग उस संबंध को व्यक्त करने के रूपात्मक साधन हैं। विद्यालयी हिंदी में आठ कारक सामान्यतः पढ़ाए जाते हैं।

कारकसामान्य संबंधउदाहरण
कर्ताकार्य करने वालाबच्चा हँसा।
कर्मकार्य से संबंधित लक्ष्य या प्रभावित इकाईरीना ने पुस्तक पढ़ी।
करणसाधनउसने कलम से लिखा।
संप्रदानपाने वाला या हितग्राहीमाँ ने बच्चे को फल दिया।
अपादानअलगाव या स्रोतपत्ता पेड़ से गिरा।
संबंधदो संज्ञात्मक पदों का संबंधरीना की पुस्तक
अधिकरणस्थान, समय या आधारमेज़ पर पुस्तक है।
संबोधनपुकारनामित्रो, सुनो।

एक ही चिह्न अलग संबंध व्यक्त कर सकता है। “कलम से लिखा” में साधन है, जबकि “पेड़ से गिरा” में अलगाव। हर कर्ता के साथ ‘ने’ और हर कर्म के साथ ‘को’ लगना आवश्यक नहीं है।

हिंदी में ने का प्रयोग

मानक हिंदी में अनेक सकर्मक क्रियाओं के पूर्णताबोधक प्रयोगों में कर्ता के साथ ‘ने’ आता है: सीमा ने कहानी पढ़ी। इसे केवल ‘भूतकाल का चिह्न’ कहना अधूरा है; “सीमा ने कहानी पढ़ी है” में भी यह उपस्थित है।

क्रिया का मेल समझने के लिए तुलना करें: सीमा ने कहानी पढ़ी, सीमा ने पत्र पढ़ा, सीमा ने बच्चों को बुलाया। पहले दो वाक्यों में अचिह्नित कर्म के लिंग के अनुसार क्रिया बदली है। तीसरे में ‘को’ चिह्नित कर्म के कारण ‘बुलाया’ सामान्य पुल्लिंग एकवचन रूप में आया है। अपवाद और क्रिया-विशेष का व्यवहार अलग से पढ़ना चाहिए।

सर्वनाम और विशेषण

सर्वनाम और पुरुष

सर्वनाम व्यक्ति, वस्तु या संदर्भ की ओर संकेत करता है और संज्ञात्मक पद की भूमिका निभा सकता है। इसे केवल पहले लिखी हुई संज्ञा के स्थान पर आने वाला शब्द मानना पर्याप्त नहीं है। ‘मैं’ और ‘तुम’ संवाद की स्थिति से अपना संदर्भ पाते हैं।

सर्वनाम का भेदउदाहरण
पुरुषवाचकमैं, हम, तुम, आप, वह, वे
निश्चयवाचकयह, वह
अनिश्चयवाचककोई, कुछ
प्रश्नवाचककौन, क्या
संबंधवाचकजो
निजवाचकस्वयं, खुद; संदर्भानुसार अपना

उत्तम पुरुष बोलने वाला, मध्यम पुरुष सुनने वाला और अन्य पुरुष जिसके बारे में कहा जाए, उसे व्यक्त करता है। ‘आप’ आदरसूचक मध्यम पुरुष है। ‘वह’ जैसे रूपों की पहचान संदर्भ के अनुसार पुरुषवाचक या निश्चयवाचक की जा सकती है।

विशेषण और विशेष्य

विशेषण संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता, संख्या या परिमाण आदि बताता है। जिसकी विशेषता बताई जाए, वह विशेष्य है। “नीला आकाश” में ‘नीला’ विशेषण और ‘आकाश’ विशेष्य है।

गुणवाचक विशेषण के उदाहरण ‘मीठा’, ‘सुंदर’ और ‘कठोर’ हैं। ‘तीन पुस्तकें’ में संख्यावाचक और ‘थोड़ा पानी’ में परिमाणवाचक विशेषण है। “यह पुस्तक मेरी है” में ‘यह’ सार्वनामिक विशेषण है, जबकि “यह मेरी है” में वही रूप सर्वनाम का कार्य करता है।

विशेषण की तुलना को मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था में समझाया जाता है। हिंदी में ‘ऊँचा’, ‘से ऊँचा’ और ‘सबसे ऊँचा’ जैसी संरचनाएँ अधिक स्वाभाविक हैं। संस्कृतनिष्ठ ‘तर’ और ‘तम’ हर विशेषण के साथ यांत्रिक रूप से नहीं लगाए जाते।

क्रिया काल पक्ष और वाच्य

क्रिया और धातु

क्रिया से कार्य, घटना या अवस्था का बोध होता है। ‘पढ़ना’ कार्य, ‘गिरना’ घटना और ‘होना’ अवस्था व्यक्त कर सकता है। क्रिया के मूल आधार को धातु कहा जाता है, जैसे ‘पढ़ना’ का आधार ‘पढ़’।

प्रकारमुख्य पहचानउदाहरण
सकर्मककर्म ग्रहण करने वाला प्रयोगवह पत्र लिखता है।
अकर्मककर्म के बिना पूर्ण होने वाला प्रयोगबच्चा सोता है।
मुख्य क्रियाप्रमुख कार्य या अवस्थावह पढ़ रहा है। इसमें ‘पढ़’
सहायक क्रियाकाल, पक्ष आदि में सहायतावह पढ़ रहा है। इसमें ‘है’
संयुक्त क्रियाक्रियाओं के मेल से विशिष्ट अर्थउसने पत्र लिख दिया।
प्रेरणार्थककिसी से कार्य कराने का बोधपढ़ना–पढ़ाना–पढ़वाना
नामधातुसंज्ञा या विशेषण से बना क्रियारूपहाथ–हथियाना
पूर्वकालिकदूसरी क्रिया से पहले हुआ कार्यवह खाकर सो गया।

सकर्मकता की पहचान के लिए केवल ‘क्या’ या ‘किसको’ पूछना शुरुआती उपाय है। अंतिम निर्णय पूरे वाक्य से होता है। एक ही क्रिया का अलग संदर्भों में अलग व्यवहार हो सकता है।

काल और क्रिया की अवस्था

काल घटना का समय-संबंध बताता है। उसके तीन प्रमुख वर्ग वर्तमान, भूत और भविष्यत् हैं। पक्ष यह बताता है कि घटना आदतन होती है, चल रही है या पूरी हो चुकी है। विद्यालयी काल-भेदों में समय, पक्ष और संभावना के अर्थ कई बार साथ रखे जाते हैं।

वाक्यसमय या पक्ष की मुख्य सूचना
वह रोज़ पढ़ता है।वर्तमान में आदत या नियमितता
वह पढ़ रहा है।वर्तमान में जारी कार्य
वह पढ़ चुका है।कार्य पूरा होने का बोध
वह पढ़ रहा था।अतीत में जारी कार्य
वह पढ़ चुका था।अतीत के संदर्भ-बिंदु से पहले पूर्णता
वह कल पढ़ेगा।भविष्य का समय
वह घर पर होगा।संदर्भ के अनुसार भविष्य या वर्तमान की संभावना

काल के उपभेदों में सामान्य, अपूर्ण, पूर्ण, संदिग्ध, संभाव्य और हेतुहेतुमद जैसे नाम मिलते हैं। इनकी संख्या और नाम अध्ययन-परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। क्रिया-समूह का अर्थ समझना केवल नाम याद करने से अधिक उपयोगी है।

वाच्य और वाच्य परिवर्तन

वाच्य क्रिया की वह व्याकरणिक व्यवस्था है जिसमें कर्ता, कर्म और क्रिया-भाव की प्रस्तुति बदलती है। विद्यालयी अध्ययन में कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य प्रमुख हैं।

वाच्यउदाहरणध्यान देने योग्य बात
कर्तृवाच्यरीना पत्र लिखती है।कर्ता कार्य करने वाले के रूप में प्रस्तुत है।
कर्मवाच्यपत्र रीना द्वारा लिखा जाता है।कर्म की प्रस्तुति और क्रिया की रचना बदली है।
भाववाच्यमुझसे अब चला नहीं जाता।अकर्मक क्रिया-भाव का प्रधान प्रयोग है।

वाच्य बदलते समय केवल ‘द्वारा’ जोड़ना पर्याप्त नहीं है। क्रिया की सकर्मकता, काल, नकार और लिंग-वचन का मेल भी जाँचना चाहिए। रूपांतरण में मूल आशय सुरक्षित रहना चाहिए।

अव्यय और निपात

अव्यय वे शब्द हैं जिनका रूप सामान्यतः लिंग, वचन या पुरुष से नहीं बदलता। वे वाक्य में संबंध, रीति, समय, स्थान, संयोजन और भाव व्यक्त करते हैं।

प्रकारकार्यउदाहरण
क्रिया-विशेषणकार्य का समय, स्थान, ढंग या परिमाणआज, यहाँ, धीरे, बहुत
संबंधबोधकपदों के बीच संबंधके पास, के बिना, के ऊपर
समुच्चयबोधकपदों या उपवाक्यों को जोड़नाऔर, लेकिन, क्योंकि
विस्मयादिबोधकभाव की तात्कालिक अभिव्यक्तिअरे, वाह, हाय
निपातबल, सीमा या अतिरिक्त संकेतही, भी, तो, मात्र

“मैं ही जाऊँगा” और “मैं भी जाऊँगा” में अंतर केवल एक शब्द का है, लेकिन आशय बदल जाता है। पहले वाक्य में चयन या बल है; दूसरे में अन्य लोगों के साथ वक्ता का समावेश है। निपात का अर्थ समझने के लिए उसके स्थान पर ध्यान देना चाहिए।

शब्द निर्माण में उपसर्ग और प्रत्यय

उपसर्ग शब्द के पहले जुड़कर अर्थ को प्रभावित करता है और प्रत्यय आधार के बाद जुड़कर नया शब्द बनाता है। उदाहरण: अ + सफल = असफल, मित्र + ता = मित्रता।

कृत प्रत्यय धातु या क्रियात्मक आधार से और तद्धित प्रत्यय संज्ञा, विशेषण आदि गैर-धात्विक आधारों से नए शब्द बनाते हैं। ‘पढ़ाई’ और ‘लिखावट’ क्रियात्मक आधार से बने शब्द हैं; ‘मित्रता’ और ‘बचपन’ गैर-धात्विक आधार से बने हैं। शब्द बनते समय आधार में ध्वनि या रूप का परिवर्तन भी हो सकता है।

प्रत्यय की पहचान करते हुए हर समान अंत वाले शब्द को एक ही ढाँचे में न बाँटें। मूल शब्द, उसका अर्थ और निर्माण की स्वीकृत प्रक्रिया तीनों देखें। इसी प्रकार बहुवचन या कारक के लिए होने वाला रूप-परिवर्तन और नया शब्द बनाने की प्रक्रिया अलग हैं।

संधि और संधि विच्छेद

निकट आने वाली ध्वनियों के मेल से होने वाला नियमानुसार परिवर्तन संधि कहलाता है। संधि-विच्छेद उस संयुक्त रूप के आधारभूत अंश स्पष्ट करता है। हिंदी में संस्कृत से आए शब्दों को समझने में इसका विशेष उपयोग है।

भेदसंक्षिप्त नियम या आधारउदाहरण
दीर्घ स्वर संधिसमान स्वर-वर्गों के मेल से दीर्घ रूपविद्या + आलय = विद्यालय
गुण स्वर संधिअ/आ के बाद इ/ई, उ/ऊ, ऋ के विशिष्ट मेलदेव + इंद्र = देवेंद्र
वृद्धि स्वर संधिअ/आ के बाद ए/ऐ या ओ/औ का मेलसदा + एव = सदैव
यण स्वर संधिइ/ई, उ/ऊ, ऋ का भिन्न स्वर के आगे य्, व्, र् में परिवर्तनअति + अधिक = अत्यधिक
अयादि स्वर संधिए, ऐ, ओ, औ के स्थान पर अय्, आय्, अव्, आव्गै + अक = गायक
व्यंजन संधिव्यंजन-संबंधी परिवर्तनसत् + जन = सज्जन
विसर्ग संधिविसर्ग का नियमानुसार परिवर्तननिः + आशा = निराशा

ये पहचान के उदाहरण हैं; प्रत्येक संधि के पूर्ण नियम और अपवाद अलग अध्ययन माँगते हैं। हर शब्द को केवल उसकी वर्तनी देखकर किसी कल्पित संधि में तोड़ना उचित नहीं है।

समास और समास विग्रह

परस्पर अर्थ-संबंध रखने वाले दो या अधिक पदों से संक्षिप्त पद-रचना बनना समास है। समास-विग्रह उस संबंध को विस्तार से व्यक्त करता है। भेद पहचानने के लिए शब्द की बाहरी बनावट के साथ उसका अभिप्रेत अर्थ भी देखना चाहिए।

भेदसमस्त पदविग्रह या अर्थ
अव्ययीभावप्रतिदिनप्रत्येक दिन
तत्पुरुषराजपुत्रराजा का पुत्र
कर्मधारयनीलकमलनीला कमल
द्विगुत्रिलोकतीन लोकों का समाहार
द्वंद्वमाता-पितामाता और पिता
बहुव्रीहिदशाननदस आनन हैं जिसके, अर्थात रावण

कर्मधारय और द्विगु को कुछ परंपराएँ तत्पुरुष के अंतर्गत रखती हैं। बहुव्रीहि की पहचान में यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि पूरा पद अपने घटकों से अलग किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का बोध करा रहा है या नहीं।

संधि का मुख्य आधार ध्वनि-परिवर्तन है; समास का मुख्य आधार पदों का अर्थ-संबंध है। किसी शब्द में दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ भी हो सकती हैं। संधि-विच्छेद और समास-विग्रह इसलिए अलग प्रकार के उत्तर हैं।

वाक्य पदबंध उपवाक्य और पद परिचय

वाक्य की संरचना

वाक्य संदर्भ में अपेक्षाकृत पूर्ण संदेश व्यक्त करने वाली भाषिक इकाई है। पारंपरिक विवेचन में अर्थपूर्ण वाक्य के लिए आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति की चर्चा की जाती है। इनसे आशय है कि पदों में आवश्यक अर्थ-संबंध हो, उनका मेल उपयुक्त हो और वे समझने योग्य निकटता में जुड़े हों।

विद्यालयी अध्ययन में वाक्य के दो अंग उद्देश्य और विधेय बताए जाते हैं। “मेहनती विद्यार्थी प्रतिदिन अभ्यास करते हैं” में ‘मेहनती विद्यार्थी’ उद्देश्य और शेष भाग विधेय है। वास्तविक संवाद में कुछ अंग संदर्भ से समझे जाते हैं: “कौन आया?” के उत्तर में “रीना” भी पूर्ण संदेश दे सकता है।

रचना के आधार पर वाक्य

भेदपहचानउदाहरण
सरलएक स्वतंत्र उपवाक्यघंटी बजते ही बच्चे बाहर आए।
संयुक्तसमन्वित स्वतंत्र उपवाक्यघंटी बजी और बच्चे बाहर आए।
मिश्रमुख्य और आश्रित उपवाक्यजैसे ही घंटी बजी, बच्चे बाहर आए।

केवल ‘और’ देखकर संयुक्त वाक्य नहीं मानना चाहिए। “रीना और मोहन आए” में दो संज्ञाएँ जुड़ी हैं, दो स्वतंत्र उपवाक्य नहीं। रूपांतरण में काल, निषेध, शर्त और घटना-क्रम बचाए रखना आवश्यक है।

अर्थ के आधार पर वाक्य

विधानवाचक वाक्य सूचना देता है: “वह घर पर है।” निषेधवाचक में नकार है: “वह घर पर नहीं है।” प्रश्नवाचक पूछता है: “क्या वह घर पर है?” आज्ञावाचक में आदेश या अनुरोध है: “कृपया बैठिए।”

इसके अतिरिक्त इच्छावाचक (“आप सफल हों”), विस्मयवाचक (“कितना सुंदर दृश्य है!”), संदेहवाचक (“शायद वह आए”) और संकेतवाचक या शर्तसूचक (“यदि पढ़ोगे, तो समझोगे”) रूप पढ़े जाते हैं। विभिन्न पुस्तकों में नाम और संख्या में अंतर मिल सकता है।

पदबंध और उपवाक्य में अंतर

पदबंध शब्दों का ऐसा समूह है जो वाक्य में एक इकाई की तरह कार्य करता है। उसकी पहचान केवल पहले शब्द से नहीं, पूरे समूह के कार्य से होती है। उपवाक्य में कथन या विधेय की संरचना होती है; आश्रित उपवाक्य मुख्य वाक्य पर निर्भर रहता है।

उदाहरणपहचानकारण
नीली कमीज़ वाला लड़का आया।‘नीली कमीज़ वाला लड़का’ संज्ञा पदबंधसमूह कर्ता की संज्ञात्मक भूमिका निभाता है।
वह बहुत धीरे चला।‘बहुत धीरे’ क्रिया-विशेषण पदबंधचलने की रीति बताता है।
मुझे पता है कि वह आएगा।‘कि वह आएगा’ संज्ञा उपवाक्यजानने की विषयवस्तु बताता है।
जो छात्र पढ़ता है, वह सीखता है।‘जो छात्र पढ़ता है’ विशेषण उपवाक्यछात्र की पहचान सीमित करता है।
जब वर्षा हुई, तब हम लौटे।‘जब वर्षा हुई’ क्रिया-विशेषण उपवाक्यलौटने का समय बताता है।

पद परिचय कैसे दें

पद-परिचय में शब्दभेद के साथ उस पद के प्रासंगिक व्याकरणिक गुण और संबंध बताए जाते हैं। संज्ञा के लिए भेद, लिंग, वचन, कारक और संबंध; विशेषण के लिए भेद और विशेष्य; क्रिया के लिए भेद, काल, पुरुष, वचन तथा संबंधित पद महत्त्वपूर्ण होते हैं। सभी पदों पर एक ही सूची लागू नहीं होती।

उदाहरण: रीमा धीरे चलती है। ‘रीमा’ व्यक्तिवाचक संज्ञा, स्त्रीलिंग, एकवचन और कर्ता है। ‘धीरे’ रीतिवाचक क्रिया-विशेषण है। ‘चलती है’ अकर्मक क्रिया-समूह है, जो सामान्य वर्तमान का बोध कराता है और कर्ता के अनुरूप स्त्रीलिंग एकवचन में है।

वर्तनी विराम चिह्न और वाक्य शुद्धि

शुद्ध लेखन के मुख्य आधार

वर्तनी में मात्राएँ, अनुस्वार, चंद्रबिंदु, नुक्ता, संयुक्ताक्षर और शब्द-विभाजन शामिल हैं। ‘कि’ और ‘की’ जैसे छोटे भेद भी अर्थ तथा व्याकरण बदल सकते हैं: उसने कहा कि रीना की पुस्तक मिल गई।

मानक लेखन में संज्ञा के साथ परसर्ग सामान्यतः अलग लिखे जाते हैं: ‘राम ने’, ‘घर में’। सर्वनाम के कुछ रूप जुड़े हुए मिलते हैं: ‘उसने’, ‘उसको’। दो परसर्गों वाले रूपों में ‘उसके लिए’ और ‘उसमें से’ जैसे प्रयोग ध्यान देने योग्य हैं।

अशुद्ध या असंगत प्रयोगमानक रूपसुधार का आधार
लड़कियाँ खेल रहा है।लड़कियाँ खेल रही हैं।लिंग और वचन का मेल
उसने पुस्तक पढ़ा।उसने पुस्तक पढ़ी।अचिह्नित कर्म के अनुरूप क्रिया
मेरे को यह अच्छा लगा।मुझे यह अच्छा लगा।औपचारिक मानक में सर्वनाम का चयन
कृप्या यहाँ बैठें।कृपया यहाँ बैठें।वर्तनी
आशिर्वादआशीर्वादस्वर की मात्रा
उज्जवलउज्ज्वलसंयुक्त व्यंजन

बोलचाल के किसी रूप का मानक रूप से भिन्न होना और उसका अपने समुदाय में अव्यवस्थित होना एक बात नहीं है। वाक्य-सुधार करते समय अपेक्षित औपचारिक संदर्भ स्पष्ट रहना चाहिए।

विराम चिह्न अर्थ कैसे बदलते हैं

पूर्णविराम कथन की समाप्ति, अल्पविराम हल्का विराम या सूची, प्रश्नवाचक चिह्न प्रश्न और विस्मयादिबोधक चिह्न प्रबल भाव व्यक्त करता है। उद्धरण-चिह्न किसी के कथन या विशिष्ट अभिव्यक्ति को अलग दिखाते हैं।

रुको, मत जाओ। और रुको मत, जाओ। में वही शब्द हैं, लेकिन विराम बदलने से निर्देश बदल गया। विराम-चिह्न लगाते समय केवल साँस के ठहराव के बजाय अर्थ और वाक्य-संबंध भी देखें।

शब्द भंडार और अर्थ संबंध

शब्द-भंडार का अध्ययन केवल लंबी सूचियाँ याद करना नहीं है। शब्द का अर्थ, प्रसंग, भाव और प्रचलित संगति समझना भी आवश्यक है। पर्यायवाची शब्द हर संदर्भ में एक-दूसरे के स्थान पर नहीं रखे जा सकते।

विषयअर्थउदाहरण
पर्यायवाचीनिकट या समान अर्थ वाले शब्दजल, पानी, नीर
विलोमविरोधी अर्थ वाले शब्दलाभ–हानि
अनेकार्थीएक शब्द के अनेक अर्थहार: पराजय या गले का आभूषण
श्रुतिसमभिन्नार्थकमिलते-जुलते उच्चारण, अलग अर्थअवधि–अवधी
अनेक शब्दों के लिए एक शब्दसंक्षिप्त अर्थपूर्ण अभिव्यक्तिजो कभी न मरे: अमर
शब्द-युग्मअर्थ या प्रयोग से संबद्ध जोड़ेसुख-दुःख, मान-सम्मान
एकार्थक शब्दअध्ययन-संदर्भ में एक निश्चित अर्थ पर केंद्रित शब्दतकनीकी संदर्भ में ‘त्रिभुज’

‘एकार्थक’ शब्द की संज्ञा अलग पुस्तकों में अलग अर्थों में मिल सकती है। शब्द सामान्य भाषा में प्रसंगानुसार विस्तृत अर्थ ग्रहण कर सकते हैं। समानार्थी शब्दों के सूक्ष्म अंतर भी देखें: गर्व उचित आत्मसम्मान व्यक्त कर सकता है, जबकि घमंड में प्रायः नकारात्मक मूल्यांकन होता है।

मुहावरे और लोकोक्तियाँ

मुहावरा प्रचलित पदसमूह है जिसका अर्थ केवल उसके शब्दों के शाब्दिक अर्थ से नहीं निकलता। ‘हाथ बँटाना’ का अर्थ सहायता करना है। उदाहरण: “बच्चों ने सफ़ाई में शिक्षक का हाथ बँटाया।”

लोकोक्ति अनुभव या सामान्य धारणा व्यक्त करने वाला प्रचलित कथन है। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ कर्म और परिणाम का संबंध बताता है। मुहावरा सामान्यतः वाक्य का अंग बनता है; लोकोक्ति प्रायः पूर्ण कथन होती है। इनके प्रयोग में प्रसंग, रूप और अर्थ तीनों उपयुक्त होने चाहिए।

पूरक अध्ययन में काव्य और अभिव्यक्ति

व्यापक हिंदी-अध्ययन में व्याकरण के साथ साहित्यिक भाषा का परिचय भी उपयोगी है। अलंकार, रस, छंद और शब्द-शक्ति समझने से कविता और गद्य में व्यक्त अर्थ के अलग स्तर खुलते हैं।

प्रमुख अलंकार

अलंकार भाषा की ऐसी कलात्मक व्यवस्था है जो ध्वनि, अर्थ, तुलना या कल्पना से अभिव्यक्ति को विशिष्ट बनाती है। पहचान करते समय केवल कोई एक संकेत-शब्द नहीं, पूरा आशय देखें।

अलंकारमुख्य पहचानसरल उदाहरण या संकेत
अनुप्रासवर्ण की कलात्मक आवृत्तिमीठी मुसकान मन मोह ले।
यमकशब्द की पुनरावृत्ति, अर्थ अलगएक ही शब्द दो बार अलग अर्थों में आए।
श्लेषएक प्रयुक्त शब्द में एकाधिक अर्थों की संगतिप्रसंग एक साथ दो अर्थ संभव करे।
उपमासमानता पर आधारित स्पष्ट तुलनाउसका मुख चाँद के समान है।
रूपकउपमेय पर उपमान का सीधा आरोपउसका मुख चाँद है।
उत्प्रेक्षाकल्पित संभावनाबादल ऐसे उठे मानो पर्वत उड़ चले हों।
अतिशयोक्तिजानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर कहनातुम्हें हज़ार बार समझाया।
मानवीकरणअमानवीय वस्तु को मानवीय क्रिया या गुणसुबह ने खिड़की पर दस्तक दी।

यमक में पुनरावृत्ति और भिन्न अर्थ दोनों आवश्यक हैं। श्लेष में शब्द एक बार आने पर भी अनेक अर्थ दे सकता है। हर ‘मानो’ वाले साधारण वाक्य में उत्प्रेक्षा या हर तुलना में काव्यगत उपमा मान लेना उचित नहीं है।

रस और उसके अंग

रस साहित्य के आस्वादन से उत्पन्न सौंदर्यात्मक भावानुभूति है। इसकी व्याख्या में स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और संचारीभाव का संबंध समझाया जाता है। विभाव भाव-जागरण की परिस्थितियाँ हैं; अनुभाव उसकी बाहरी अभिव्यक्तियाँ और संचारीभाव सहायक, परिवर्तनशील भाव हैं।

प्रचलित नौ रस हैं: शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत। इनके स्थायीभाव क्रमशः रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय और निर्वेद माने जाते हैं। कुछ अध्ययन-परंपराओं में वात्सल्य और भक्ति का पृथक विवेचन भी मिलता है।

छंद और मात्रा गणना

छंद पद्य की लयात्मक संरचना है, जिसमें मात्रा या वर्ण, चरण, यति और गति जैसे तत्व महत्त्वपूर्ण होते हैं। मात्रिक छंद में मात्राओं का और वर्णिक छंद में वर्णों तथा उनके विन्यास का विधान प्रमुख होता है।

विद्यालयी मात्रा-गणना में लघु की एक और गुरु की दो मात्राएँ मानी जाती हैं। संयुक्त व्यंजन से पहले का ह्रस्व वर्ण कई स्थितियों में गुरु हो जाता है; इसलिए मात्राएँ केवल लिखित मात्रा-चिह्न देखकर नहीं गिनी जातीं। दोहा के विषम चरणों में 13 और सम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं। चौपाई के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरणांत आदि के अतिरिक्त नियम भी पढ़ने चाहिए। सोरठा, रोला, सवैया और कवित्त का अध्ययन इसी आधार को आगे बढ़ाता है।

शब्द शक्ति

अभिधा से मुख्य या प्रचलित अर्थ, लक्षणा से मुख्य अर्थ की अनुपयुक्तता या विशेष संबंध के आधार पर लक्षित अर्थ और व्यंजना से अतिरिक्त संकेतित अर्थ समझा जाता है। “गाँव सो रहा है” में संदर्भानुसार ‘गाँव’ से उसके निवासियों का अर्थ लिया जाता है। शब्द-शक्ति पहचानते समय संदर्भ निर्णायक है; एक अकेला शब्द हर जगह एक ही शक्ति में प्रयुक्त नहीं होता।

अपठित बोध और व्यावहारिक लेखन

व्याकरण का व्यावहारिक उद्देश्य अर्थ समझना और प्रभावी अभिव्यक्ति करना है। अपठित गद्यांश में मुख्य विचार, तथ्य, निष्कर्ष, शीर्षक और प्रसंगानुकूल शब्दार्थ पहचानें। उत्तर पाठ के प्रमाण पर आधारित होना चाहिए; अपने सामान्य ज्ञान से ऐसी बात न जोड़ें जो अंश में समर्थित न हो। काव्यांश में वक्ता, भाव, बिंब और संकेतित अर्थ पर भी ध्यान दें।

लेखन के प्रमुख रूप

लेखन रूपआवश्यक ध्यान
अनुच्छेद और निबंधएक केंद्रीय विचार, तार्किक क्रम, उपयुक्त उदाहरण
औपचारिक पत्र और आवेदनउद्देश्य, आवश्यक विवरण, विनम्र और स्पष्ट निवेदन
अनौपचारिक पत्रसंबंध के अनुरूप संबोधन और स्वाभाविक भाषा
ईमेलस्पष्ट विषय-पंक्ति, संक्षिप्त मुख्य संदेश, उचित समापन
सूचना और संदेशकिसके लिए, क्या, कब, कहाँ और आवश्यक कार्रवाई
विज्ञापनआवश्यक तथ्य और संक्षिप्त, विश्वसनीय प्रस्तुति
संवाद और लघुकथास्वाभाविक क्रम, पात्रानुकूल भाषा और संगति
चित्र-वर्णनदिखाई दे रहे विवरण और व्यवस्थित प्रस्तुति
सार और संक्षेपणमूल विचार सुरक्षित रखते हुए अनावश्यक विस्तार हटाना
प्रतिवेदन और समाचारतथ्य, घटना-क्रम, तटस्थता और सटीक विवरण
अनुवादमूल आशय और लक्ष्य भाषा की स्वाभाविक संरचना

हर लेखन-रूप में शब्द-सीमा, पाठक और संचार का उद्देश्य देखें। आकर्षक भाषा से पहले अर्थ की स्पष्टता और तथ्य की शुद्धता आती है। भाषा की समीक्षा करते समय सर्वनाम का संदर्भ, काल की संगति और अनुच्छेदों के बीच संबंध भी जाँचें।

हिंदी व्याकरण सीखने का प्रभावी क्रम

परिभाषा समझें, उदाहरण देखें, कारण पहचानें और अपने वाक्य बनाएँ। किसी विषय पर पकड़ तब बनती है जब विद्यार्थी उसे अपरिचित उदाहरण पर लागू कर सके।

1. आरंभ में वर्णमाला, मात्राएँ, शब्द और सरल वाक्य पढ़ें।

2. फिर संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, लिंग और वचन समझें।

3. इसके बाद कारक, काल, अव्यय और शब्द-निर्माण पढ़ें।

4. आगे संधि, समास, वाक्य-भेद, पदबंध, उपवाक्य और वाच्य का अभ्यास करें।

5. वर्तनी, शब्द-भंडार और लेखन का अभ्यास पूरे अध्ययन के साथ जारी रखें।

पुनरावृत्ति में अपनी गलतियों की छोटी सूची बनाना उपयोगी है। प्रत्येक गलती के साथ सही रूप और उसका कारण लिखें। किसी विषय की केवल सूची याद करने के बजाय उससे जुड़े दो मिलते-जुलते उदाहरणों में अंतर स्पष्ट करें। अलग कक्षाओं और अध्ययन-परंपराओं में गहराई तथा वर्गीकरण बदल सकते हैं; अपने निर्धारित पाठ्यक्रम से अध्याय और शब्दावली का मिलान करें।

हल सहित अभ्यास प्रश्न

नीचे प्रश्न पहचान, प्रयोग, रूपांतरण और कारण स्पष्ट करने का अभ्यास करवाते हैं। पहले स्वयं उत्तर लिखें, फिर उत्तर-संकेत से मिलाएँ।

पहचान और शब्द निर्माण

1. ‘मिठास’ किस प्रकार की संज्ञा है?

2. “यह पुस्तक नई है” में ‘यह’ का पदभेद बताइए।

3. “मैं ही जाऊँगा” में निपात पहचानिए और उसका कार्य बताइए।

4. ‘असफल’ में उपसर्ग अलग कीजिए।

5. ‘मित्रता’ में मूल शब्द और प्रत्यय बताइए।

6. ‘विद्यालय’ का संधि-विच्छेद और संधि का नाम लिखिए।

7. ‘सदैव’ का संधि-विच्छेद कीजिए।

8. ‘माता-पिता’ का विग्रह और समास का भेद बताइए।

9. ‘नीलकमल’ और ‘दशानन’ के समास में अंतर स्पष्ट कीजिए।

10. ‘आग’ का तत्सम रूप लिखिए।

वाक्य और रूप परिवर्तन

11. “लड़की विद्यालय गई” को बहुवचन में बदलिए।

12. “वह पत्र लिखता है” को वर्तमान में जारी कार्य के रूप में लिखिए।

13. “सीमा ने कविता पढ़ा” वाक्य शुद्ध कीजिए।

14. “रीना पत्र लिखती है” को कर्मवाच्य में बदलिए।

15. “मैं अब दौड़ नहीं सकता” को भाववाच्य में बदलिए।

16. “जब वर्षा हुई, तब हम लौटे” को सरल वाक्य में बदलिए।

17. “वह परिश्रमी है, इसलिए सफल है” को मिश्र वाक्य में बदलिए।

18. “रीना और मोहन आए” संयुक्त वाक्य क्यों नहीं है?

19. “वह बहुत धीरे चलता है” में क्रिया-विशेषण पदबंध चुनिए।

20. “मुझे विश्वास है कि तुम सफल होगे” में आश्रित उपवाक्य पहचानिए।

अर्थ वर्तनी और अभिव्यक्ति

21. ‘आशिर्वाद’ और ‘कृप्या’ की शुद्ध वर्तनी लिखिए।

22. ‘हार’ के दो अर्थ बताकर अलग वाक्य बनाइए।

23. ‘अवधि’ और ‘अवधी’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

24. ‘हाथ बँटाना’ का वाक्य में प्रयोग कीजिए।

25. “वह सिंह के समान वीर है” में अलंकार बताइए।

26. “पवन ने कान में कुछ कहा” में प्रमुख अलंकार पहचानिए।

27. दोहे के चार चरणों में मात्रा-क्रम लिखिए।

28. “रुको मत जाओ” में दो अलग अर्थों के लिए विराम-चिह्न लगाइए।

29. “कलम से लिखा” और “पेड़ से गिरा” में ‘से’ का संबंध बताइए।

30. क्या पर्यायवाची शब्द हर संदर्भ में परस्पर बदले जा सकते हैं? उदाहरण दीजिए।

उत्तर और संक्षिप्त कारण

1. भाववाचक संज्ञा, क्योंकि गुण का नाम है। 2. सार्वनामिक विशेषण, क्योंकि ‘पुस्तक’ का संकेतात्मक निर्धारण करता है। 3. ही, जो कर्ता पर बल या चयन व्यक्त करता है। 4. अ + सफल। 5. मित्र + ता।

6. विद्या + आलय; दीर्घ संधि। 7. सदा + एव; वृद्धि संधि। 8. माता और पिता; द्वंद्व समास। 9. ‘नीलकमल’ में नीले कमल का सीधा बोध होने से कर्मधारय है; रावण के अर्थ में ‘दशानन’ अन्य व्यक्ति का बोध कराने वाला बहुव्रीहि है। 10. अग्नि।

11. लड़कियाँ विद्यालय गईं। 12. वह पत्र लिख रहा है। 13. सीमा ने कविता पढ़ी। क्रिया अचिह्नित स्त्रीलिंग कर्म के अनुरूप है। 14. पत्र रीना द्वारा लिखा जाता है। 15. मुझसे अब दौड़ा नहीं जाता।

16. वर्षा होने पर हम लौटे। 17. क्योंकि वह परिश्रमी है, इसलिए सफल है। 18. ‘और’ केवल दो संज्ञाओं को जोड़ता है; दो स्वतंत्र उपवाक्य नहीं हैं। 19. बहुत धीरे। 20. कि तुम सफल होगे, जो संज्ञा उपवाक्य है।

21. आशीर्वाद, कृपया। 22. “उसने हार पहना” में आभूषण और “टीम की हार हुई” में पराजय। 23. अवधि समय की सीमा है; अवधी अवध क्षेत्र का भाषिक रूप है। 24. “रीमा ने काम में मेरा हाथ बँटाया।” 25. उपमा।

26. मानवीकरण। 27. 13–11–13–11। 28. रुको, मत जाओ। / रुको मत, जाओ। 29. पहले में करण, दूसरे में अपादान। 30. नहीं; ‘पानी-पानी होना’ में ‘पानी’ के स्थान पर ‘जल’ नहीं रखा जाता।

हिंदी व्याकरण के विषयों की संपूर्ण सूची

यह सूची मूल अवधारणाओं से उन्नत व्यावहारिक विषयों तक क्रम बनाती है। पहले मुख्य अध्याय पढ़ें, फिर उसके उपविषयों पर जाएँ। किसी विशेष समस्या के लिए सीधे संबंधित शीर्षक चुना जा सकता है।

भाषा लिपि और हिंदी का परिचय

क्रमांकविषय का शीर्षक
1भाषा क्या है? परिभाषा, रूप और विशेषताएँ
2हिंदी भाषा का उद्भव और विकास
3व्याकरण क्या है? परिभाषा, विभाग और महत्व
4भाषा, बोली और लिपि में अंतर
5देवनागरी लिपि: विशेषताएँ और विकास
6हिंदी की प्रमुख बोलियाँ और उपभाषाएँ
7मानक हिंदी: स्वरूप, विशेषताएँ और प्रयोग

वर्ण ध्वनि और उच्चारण

क्रमांकविषय का शीर्षक
8वर्ण और हिंदी वर्णमाला: स्वर, व्यंजन और वर्गीकरण
9स्वर: परिभाषा, भेद और उदाहरण
10व्यंजन: परिभाषा, भेद और उदाहरण
11हिंदी की मात्राएँ: चिह्न, प्रयोग और उदाहरण
12हिंदी बारहखड़ी: अक्षर, उच्चारण और अभ्यास
13वर्णों के उच्चारण स्थान और उच्चारण विधियाँ
14घोष-अघोष और अल्पप्राण-महाप्राण व्यंजन
15अनुस्वार और अनुनासिक: अंतर, नियम और उदाहरण
16विसर्ग: चिह्न, उच्चारण और प्रयोग
17नुक्ता: प्रयोग, नियम और उदाहरण
18संयुक्त और द्वित्व व्यंजन: अंतर और उदाहरण
19वर्ण-विच्छेद: नियम और उदाहरण
20रेफ और पदेन र: अंतर और प्रयोग

शब्द विचार और वर्गीकरण

क्रमांकविषय का शीर्षक
21शब्द-विचार: परिभाषा, वर्गीकरण और उदाहरण
22शब्द और पद में अंतर: उदाहरण सहित
23पद क्या है? परिभाषा, भेद और उदाहरण
24तत्सम और तद्भव शब्द: अंतर और सूची
25देशज और विदेशी शब्द: पहचान और उदाहरण
26रूढ़, यौगिक और योगरूढ़ शब्द: अंतर और उदाहरण
27विकारी और अविकारी शब्द: भेद और उदाहरण
28सार्थक और निरर्थक शब्द: अर्थ और प्रयोग
29संकर शब्द: परिभाषा और उदाहरण

संज्ञा लिंग वचन और कारक

क्रमांकविषय का शीर्षक
30संज्ञा: परिभाषा, भेद और उदाहरण
31व्यक्तिवाचक संज्ञा: पहचान और उदाहरण
32जातिवाचक संज्ञा: पहचान और उदाहरण
33भाववाचक संज्ञा: पहचान और बनाने के नियम
34द्रव्यवाचक संज्ञा: पहचान और उदाहरण
35समूहवाचक संज्ञा: पहचान और उदाहरण
36लिंग: पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और पहचान के नियम
37लिंग परिवर्तन: नियम और उदाहरण
38वचन: एकवचन, बहुवचन और परिवर्तन के नियम
39कारक: भेद, विभक्ति-चिह्न और उदाहरण
40कारक और विभक्ति में अंतर
41हिंदी में ‘ने’ का प्रयोग: नियम और उदाहरण

सर्वनाम और पुरुष

क्रमांकविषय का शीर्षक
42सर्वनाम: परिभाषा, भेद और उदाहरण
43पुरुष: उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष
44पुरुषवाचक सर्वनाम: उत्तम, मध्यम और अन्य पुरुष
45निश्चयवाचक और अनिश्चयवाचक सर्वनाम
46प्रश्नवाचक और संबंधवाचक सर्वनाम
47निजवाचक सर्वनाम: पहचान और उदाहरण

विशेषण

क्रमांकविषय का शीर्षक
48विशेषण: परिभाषा, भेद और उदाहरण
49गुणवाचक विशेषण: पहचान और उदाहरण
50संख्यावाचक और परिमाणवाचक विशेषण में अंतर
51सार्वनामिक विशेषण: पहचान और सर्वनाम से अंतर
52विशेषण की अवस्थाएँ: मूलावस्था, उत्तरावस्था और उत्तमावस्था

क्रिया काल और वाच्य

क्रमांकविषय का शीर्षक
53क्रिया: परिभाषा, भेद और उदाहरण
54धातु: परिभाषा और क्रिया-निर्माण
55सकर्मक और अकर्मक क्रिया: अंतर और पहचान
56मुख्य और सहायक क्रिया: अंतर और उदाहरण
57संयुक्त क्रिया: परिभाषा और उदाहरण
58प्रेरणार्थक क्रिया: भेद और बनाने के नियम
59नामधातु क्रिया: परिभाषा और उदाहरण
60पूर्वकालिक क्रिया: पहचान और उदाहरण
61काल: परिभाषा, भेद और पहचान
62वर्तमान काल: भेद और उदाहरण
63भूतकाल: भेद और उदाहरण
64भविष्यत् काल: भेद और उदाहरण
65वाच्य: कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य
66वाच्य परिवर्तन: नियम और उदाहरण

अव्यय

क्रमांकविषय का शीर्षक
67अव्यय: परिभाषा, भेद और उदाहरण
68क्रिया-विशेषण: परिभाषा, भेद और उदाहरण
69संबंधबोधक अव्यय: भेद और प्रयोग
70समुच्चयबोधक अव्यय: भेद और प्रयोग
71विस्मयादिबोधक अव्यय: अर्थ और प्रयोग
72निपात: परिभाषा, पहचान और उदाहरण

उपसर्ग और प्रत्यय

क्रमांकविषय का शीर्षक
73उपसर्ग: परिभाषा, सूची और उदाहरण
74प्रत्यय: परिभाषा, भेद और उदाहरण
75कृत और तद्धित प्रत्यय: अंतर और उदाहरण

संधि

क्रमांकविषय का शीर्षक
76संधि: परिभाषा, भेद और नियम
77स्वर संधि: भेद, नियम और उदाहरण
78दीर्घ संधि: नियम और उदाहरण
79गुण संधि: नियम और उदाहरण
80वृद्धि संधि: नियम और उदाहरण
81यण संधि: नियम और उदाहरण
82अयादि संधि: नियम और उदाहरण
83व्यंजन संधि: नियम और उदाहरण
84विसर्ग संधि: नियम और उदाहरण
85संधि-विच्छेद: विधि और उदाहरण

समास

क्रमांकविषय का शीर्षक
86समास: परिभाषा, भेद और समास-विग्रह
87अव्ययीभाव समास: पहचान और उदाहरण
88तत्पुरुष समास: भेद, पहचान और उदाहरण
89कर्मधारय समास: पहचान और उदाहरण
90द्विगु समास: पहचान और उदाहरण
91द्वंद्व समास: पहचान और उदाहरण
92बहुव्रीहि समास: पहचान और उदाहरण
93संधि और समास में अंतर

वाक्य विचार और भाषा शुद्धि

क्रमांकविषय का शीर्षक
94वाक्य-विचार: अंग, आवश्यक तत्व और भेद
95सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य: पहचान और रूपांतरण
96अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद
97पदबंध: परिभाषा, भेद और पहचान
98उपवाक्य: परिभाषा, भेद और उदाहरण
99पद-परिचय: नियम और उदाहरण
100वाक्य-शुद्धि: सामान्य अशुद्धियाँ और सुधार
101हिंदी वर्तनी: नियम और शुद्ध-अशुद्ध शब्द
102विराम-चिह्न: प्रकार, नियम और प्रयोग

शब्द भंडार और अभिव्यक्तियाँ

क्रमांकविषय का शीर्षक
103हिंदी शब्द-भंडार: पर्यायवाची, विलोम और अर्थ-संबंध
104मुहावरे और लोकोक्तियाँ: अर्थ, अंतर और प्रयोग
105पर्यायवाची शब्द: अर्थ और विषयवार सूची
106विलोम शब्द: अर्थ और सूची
107अनेकार्थी शब्द: अर्थ और वाक्य-प्रयोग
108श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द: अर्थ और अंतर
109अनेक शब्दों के लिए एक शब्द: सूची और उदाहरण
110शब्द-युग्म: प्रकार, अर्थ और उदाहरण
111एकार्थक शब्द: अर्थ और उदाहरण
112समानार्थी शब्दों के सूक्ष्म अंतर: उदाहरण सहित
113हिंदी मुहावरे: अर्थ और वाक्य-प्रयोग
114हिंदी लोकोक्तियाँ: अर्थ और प्रयोग

हिंदी व्याकरण से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदी व्याकरण की सरल परिभाषा क्या है?

हिंदी के शब्दों, उनके रूपों और वाक्यों में उनके संबंधों का नियमबद्ध अध्ययन हिंदी व्याकरण है। यह भाषा को समझने और प्रसंग के अनुरूप सही ढंग से प्रयोग करने में सहायता करता है।

हिंदी व्याकरण के कितने प्रमुख विभाग हैं?

परंपरागत विद्यालयी अध्ययन में तीन प्रमुख विभाग हैं: वर्ण-विचार, शब्द-विचार और वाक्य-विचार। व्यापक भाषा-अध्ययन में अर्थ, प्रयोग और ध्वनियों के अधिक सूक्ष्म पक्ष भी शामिल होते हैं।

हिंदी व्याकरण पढ़ना कहाँ से शुरू करें?

वर्णमाला, मात्राओं और सरल शब्दों से शुरुआत करें। उसके बाद संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, लिंग और वचन पढ़ें। कारक तथा वाक्य की समझ बनने पर संधि, समास, वाच्य और पद-परिचय का अध्ययन आसान होता है।

हिंदी भाषा और देवनागरी में क्या अंतर है?

हिंदी एक भाषा और देवनागरी एक लिपि है। भाषा का संबंध अर्थपूर्ण संप्रेषण से है; लिपि उसे लिखने की चिह्न-व्यवस्था है। देवनागरी में हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाएँ भी लिखी जाती हैं।

हिंदी वर्णमाला की संख्या अलग अलग क्यों बताई जाती है?

विभिन्न गणनाओं में अतिरिक्त स्वर, नुक्तायुक्त वर्ण और संयुक्ताक्षर शामिल करने का तरीका अलग होता है। इसलिए संख्या के साथ यह जानना आवश्यक है कि किन चिह्नों को गिना गया है।

अनुस्वार और अनुनासिक में क्या अंतर है?

अनुस्वार ‘ं’ लिखित चिह्न है, जो प्रायः नासिक्य व्यंजन दर्शाता है। अनुनासिकता स्वर के उच्चारण का गुण है, जिसे सामान्यतः चंद्रबिंदु से दर्शाते हैं। कुछ शब्दों में बिंदु भी स्वर की अनुनासिकता व्यक्त करता है।

शब्द और पद में क्या अंतर है?

शब्द भाषा की अर्थपूर्ण इकाई है। वाक्य में प्रयुक्त होकर जब वह व्याकरणिक भूमिका और संबंध ग्रहण करता है, तो उसे पद कहते हैं। ‘पुस्तक’ शब्द है; “पुस्तक खुली है” में वह संज्ञा पद है।

संज्ञा के तीन भेद हैं या पाँच?

दोनों वर्गीकरण प्रचलित हैं। व्यक्तिवाचक, जातिवाचक और भाववाचक मुख्य तीन भेद हैं। पाँच वाले वर्गीकरण में द्रव्यवाचक और समूहवाचक को स्वतंत्र रखा जाता है; अन्य परंपराएँ इन्हें जातिवाचक में समाहित करती हैं।

सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण कैसे पहचानें?

“यह आया” में ‘यह’ संज्ञात्मक भूमिका में सर्वनाम है। “यह लड़का आया” में ‘यह’ संज्ञा ‘लड़का’ का निर्धारण करता है, इसलिए सार्वनामिक विशेषण है। निर्णय पूरे प्रयोग से करें।

कारक और विभक्ति क्या एक ही हैं?

कारक व्याकरणिक संबंध है; विभक्ति या परसर्ग उस संबंध की अभिव्यक्ति का साधन हो सकता है। एक ही चिह्न अलग कारक-संबंध बता सकता है और कुछ संबंध बिना स्पष्ट चिह्न के भी व्यक्त होते हैं।

क्या ने केवल भूतकाल में आता है

नहीं। इसका संबंध केवल समय से नहीं, क्रिया की संरचना और पूर्णताबोधक प्रयोग से भी है। “उसने पत्र लिखा है” में वर्तमान संदर्भ वाला सहायक रूप है, फिर भी ‘ने’ आया है।

सकर्मक और अकर्मक क्रिया में क्या अंतर है?

सकर्मक प्रयोग में क्रिया कर्म ग्रहण करती है, जैसे “वह पुस्तक पढ़ता है।” अकर्मक प्रयोग में कर्म आवश्यक नहीं होता, जैसे “वह सोता है।” पहचान करते समय क्रिया का पूरे वाक्य में प्रयोग देखें।

काल और वाच्य में क्या अंतर है?

काल घटना का समय-संबंध बताता है। वाच्य कर्ता, कर्म और क्रिया-भाव की व्याकरणिक प्रस्तुति से संबंधित है। एक ही समय-संदर्भ को कर्तृवाच्य या कर्मवाच्य में व्यक्त किया जा सकता है।

संधि और समास में क्या अंतर है?

संधि में निकटवर्ती ध्वनियों का परिवर्तन मुख्य है। समास में पदों का अर्थ-संबंध और संक्षिप्त निर्माण मुख्य है। ‘विद्यालय’ का संधि-विच्छेद ‘विद्या + आलय’ है; ‘राजपुत्र’ का समास-विग्रह ‘राजा का पुत्र’ है।

पदबंध और उपवाक्य में क्या अंतर है?

पदबंध वाक्य में एक पद जैसी भूमिका निभाने वाला शब्दसमूह है। उपवाक्य में कथन या विधेय की संरचना होती है। “लाल कमीज़ वाला लड़का” पदबंध है; “जो लड़का लाल कमीज़ पहने है” आश्रित उपवाक्य है।

क्या और होने से वाक्य संयुक्त हो जाता है?

नहीं। ‘और’ शब्दों को भी जोड़ सकता है। “सीता और गीता आईं” में एक उपवाक्य है। “सीता आई और गीता चली गई” में दो स्वतंत्र उपवाक्य हैं, इसलिए वह संयुक्त वाक्य है।

मुहावरे और लोकोक्ति में क्या अंतर है?

मुहावरा सामान्यतः वाक्य के भीतर विशिष्ट अर्थ देता है, जैसे ‘आँखों का तारा’। लोकोक्ति प्रायः अनुभव या सामान्य धारणा व्यक्त करने वाला पूर्ण कथन है, जैसे ‘एकता में बल है’।

क्या अलंकार रस और छंद व्याकरण के मूल विभाग हैं?

ये मुख्यतः काव्यशास्त्र और साहित्यिक अध्ययन से संबंधित हैं। व्यापक हिंदी-अध्ययन में इन्हें व्याकरण और रचना के साथ पढ़ा जाता है, लेकिन विषयगत अंतर समझना आवश्यक है।

व्याकरण में अच्छे उत्तर कैसे लिखें?

पहले माँगा गया कार्य पहचानें: भेद बताना, कारण देना, विग्रह करना या रूपांतरण करना। फिर सटीक उत्तर लिखें और जहाँ आवश्यक हो, छोटा कारण जोड़ें। अनावश्यक विस्तार की अपेक्षा नियम और उदाहरण की संगति अधिक उपयोगी है।