सांख्य योग – Sankhya Yog

भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय ‘सांख्य योग’ ज्ञान और कर्म के समन्वय का दार्शनिक आधार प्रस्तुत करता है। विषादग्रस्त अर्जुन को संबोधित करते हुए कृष्ण आत्मा की नित्य, अविनाशी और अजर-अमर सत्ता का प्रतिपादन करते हैं। वे समझाते हैं कि शरीर नश्वर है, पर आत्मा शाश्वत है; अतः मोह और शोक का त्याग कर कर्तव्यपालन ही धर्म है। इस अध्याय में स्थिर बुद्धि, समत्वभाव, निष्काम कर्म और आत्मज्ञान की महत्ता प्रतिपादित होती है। ‘सांख्य योग’ मानव को विवेकपूर्ण दृष्टि प्रदान कर जीवन के संघर्षों में संतुलित, निर्भीक और कर्मनिष्ठ बनने की प्रेरणा देता है।

श्लोक – 1

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श्लोक – 2

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श्लोक – 3

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श्लोक – 4

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श्लोक – 5

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श्लोक – 6

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श्लोक – 7

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श्लोक – 8

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श्लोक – 9

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श्लोक – 10

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श्लोक – 11

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श्लोक – 12

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श्लोक – 13

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श्लोक – 14

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श्लोक – 15

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श्लोक – 16

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श्लोक – 17

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श्लोक – 18

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श्लोक – 19

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श्लोक – 20

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श्लोक – 21

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श्लोक – 22

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श्लोक – 23

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श्लोक – 24

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श्लोक – 25

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श्लोक – 26

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श्लोक – 27

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श्लोक – 28

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श्लोक – 29

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श्लोक – 30

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श्लोक – 31

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